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रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी स्मृति चिकित्सालय में एक बड़ी दुर्घटना

रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी स्मृति चिकित्सालय में एक बड़ी दुर्घटना हु

14 दिसंबर को रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी स्मृति चिकित्सालय में एक बड़ी दुर्घटना हुई थी। गायनी विभाग की ओटी में अचानक आग लग गई थी। इस अग्निकांड में पूरी ओटी ही जलकर राख हो गई थी। पहले इस पूरे कांड को पीडब्लूडी E & M के ऊपर लादने की कोशिश की गई। जब पीडब्लूड ने जवाब दिया तो डीन के कान खड़े हुए। डीन ने फिर दो एजेंसियों को निशाना बनाया। आग लगने का पूरा ठीकरा हाइट्स पर फोड़ा गया। हाइट्स के पास ही मशीनरी के मेंटीनेंस का ठेका है। हाइट्स के इंजीनियर की लापरवाही के कारण ही आग लगना पाया गया। इसके कारण कंपनी पर पांच लाख का जुर्माना लगाया गया। वहीं आग बुझाने के लिए भी मेडिकल कॉलेज ने कंपनी हायर की हुई है। इस कंपनी का टेंडर खत्म हो चुका है। फिर भी तीन महीने से एक्सटेंशन पर काम कराया जा रहा था। इस पर भी 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। जबकि फायर ब्रिगेड के पहुंचने से पहले जान पर खेल कर फायर सेफ्टी के कर्मचारियों ने ही आग बुझाई थी। अभी इस आग के खेल की कहानी खत्म नहीं होती। अभी कई और भी दोषी हैं, जिन्हें बचा लिया गया है। इसमें खुद डीन भी फंसते नजर आ रहे हैं।

ओटी में आगजनी की वजह पहले कटे फटे तारों की तरफ मोड़ा जा रहा था। बाद में पता चला कि नई केबिल डालने का काम कुछ ही समय पहले हुआ था। तार बदले गए थे। पीडब्लूडी E & M ने सारी पोल खोल दी। इसके बाद पता चला कि आग्निकांड की वजह वेंटीलेटर की बैट्री थी। बैट्री ड्राई हो चुकी थी। इसके कारण ही शार्ट सर्किट से आग भड़क गई थी।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि जांच में अग्निकांड के कारणों पर ही कार्रवाई हुई। लेकिन इस पूरे कांड के दौरान बड़ा कांड गायनी विभाग के डॉक्टरों और स्टाफ ने किया था। ओटी में आपरेशन के दौरान पैदा हुए नवजात को मौके पर ही छोड़ दिया गया था। नवजात बच्चा आग में जल गया था। इस लापरवाही पर किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। गायनी विभाग के डॉक्टर, नर्स और स्टाफ मौजूद था। किसी को भी नोटिस या कार्रवाई नहीं की गई। फिर से गायनी विभाग पर डीन मेहरबान नजर आए।

आगजनी के दौरान बड़ी संख्या में फायर फाइटर मिले थे। सभी एक्सपायरी हो गए थे। इन फायर फाइटर को रिफिल करने का ठेका मेडिकल कॉलेज ने रीवा के ही माहेश्वरी ट्रेडर्स को दिया हुआ था। इसका भुगतान डीन ने रोक रखा था। जबकि जुलाई में ईसी की बैठक में कंपनी को भुगतान करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद भी भुगतान नहीं किया गया। कंपनी के बिल का भुगतान आग्निकांड के बाद हुआ। इसके कारण फायर फाइटर मशीनों को रिफिल नहीं किया जा सका था।

मेडिकल कॉलेज में कितने टेंडर और ठेके चल रहे हैं। यह कोई नहीं बता सकता। अभी तक किसी को पता भी नहीं था कि आग बुझाने के लिए लगे फायर फाइटरर्स को चलाने के लिए भी टेंडर किया हुआ है। फायर फाइटर को चलाने के लिए फायर सुरक्षा टेक इलाहाबाद को ठेका दिया गया था। इस कंपनी का ठेका भी खत्म हो गया। इसे मेडिकल कॉलेज हर महीने 3 लाख के करीब का भुगतान करती है। टेंडर खत्म होने के बाद भी इससे काम लिया जा रहा था। अब इस फर्जीवाड़ा का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

वहीं जब पूरे मामले से पर्दा उठा तो अस्पताल के अधीक्षक राहुल मिश्रा से सवाल किया तो एक बार फिर वह भी पर्दा डालने की कोशिश करने लगे।

सबसे बड़ी सोचने वाली बात यह है कि विंध्य का सबसे बड़ा अस्पताल और अस्पताल के पास फायर NOC तक नहीं। क्या होगा इस सिस्टम का भला कौन जिम्मेवारी लेगा इस घटना का आखिर किसकी जवाबदेही होगी।
कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहता।

मेडिकल कॉलेज के डीन सुनील अग्रवाल से कई बार मुलाकात करने की कोशिश की गई लेकिन मजाल है डीन के कार्यालय का गेट खुल जाए।हमेशा मीटिंग का दौर चलता रहता है। श्यामशाह मेडिकल कॉलेज के ऐसे पहले दिन हैं जिनका प्रोटोकॉल स्वास्थ्य मंत्री से भी अधिक बिजी है।

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