Advertisement

Supreme Court Of India: पत्नी से 13 दिन बात न करना क्रूरता नहीं, सुसाइड केस में पति को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी

Supreme Court Of India: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए एक पति को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी से कुछ दिनों तक बातचीत न करना क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष गंभीर दुर्व्यवहार साबित करने में नाकाम रहा और इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक मतभेद और कभी-कभार की चुप्पी सामान्य बात है।

Supreme Court Of India: पति द्वारा पत्नी से कुछ दिनों तक बातचीत न करना अपने आप में “क्रूरता” नहीं माना जा सकता 

Supreme Court Of India

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति द्वारा पत्नी से कुछ दिनों तक बातचीत न करना अपने आप में “क्रूरता” नहीं माना जा सकता। अदालत ने आत्महत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेदों और अस्थायी नाराजगी को आपराधिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

यह मामला ओमान के मस्कट में इंजीनियर के रूप में कार्यरत जयेश कन्नन और उनकी पत्नी संगीता से जुड़ा है। संगीता ने 31 जनवरी 2015 को अपने मायके में आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद उनके परिवार ने आरोप लगाया कि पति द्वारा उपेक्षा और बातचीत बंद कर देने के कारण वह मानसिक तनाव में थीं, जिसके चलते उन्होंने यह कदम उठाया।

Supreme Court Of India: क्या था पूरा मामला?

Supreme Court Of India

अभियोजन पक्ष के अनुसार, संगीता अपने माता-पिता के घर गई हुई थीं। इसी दौरान जयेश ने उनसे फोन पर बातचीत करना बंद कर दिया था। आरोप था कि पति की इस बेरुखी और संवादहीनता के कारण संगीता मानसिक रूप से परेशान हो गईं और अंततः आत्महत्या कर ली।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने जयेश कन्नन को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। बाद में मद्रास हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

Supreme Court Of India: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों की विस्तार से समीक्षा की। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष पति के खिलाफ गंभीर दुर्व्यवहार या लगातार उत्पीड़न के आरोपों को साबित करने में असफल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति को दोषी ठहराने का मुख्य आधार केवल यह था कि उसने लगभग 13 दिनों तक अपनी पत्नी से बातचीत नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंधों में कभी-कभी नाराजगी, विवाद या कुछ समय तक बातचीत न होना असामान्य नहीं है और इसे स्वतः क्रूरता नहीं माना जा सकता।

Supreme Court Of India: व्हाट्सएप रिकॉर्ड पर्याप्त सबूत नहीं

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने व्हाट्सएप चैट और मौखिक गवाहियों का सहारा लिया। उनका दावा था कि पति ने पत्नी को कोई संदेश नहीं भेजा, जिससे यह साबित होता है कि उसने जानबूझकर बातचीत बंद कर दी थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि केवल व्हाट्सएप पर संदेश न भेजना यह साबित नहीं करता कि दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं था। बातचीत सामान्य फोन कॉल के माध्यम से भी हो सकती थी।

पति की ओर से यह दलील दी गई कि उसने पत्नी से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उसका फोन काम नहीं कर रहा था। इसलिए उसने पत्नी के पिता से बात की थी। अदालत ने कहा कि इस दावे को गलत साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष कोई कॉल रिकॉर्ड या तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।

क्रूरता साबित करने के लिए चाहिए लगातार उत्पीड़न

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य का हवाला देते हुए कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए लगातार, बार-बार या कम अंतराल पर होने वाले ऐसे व्यवहार को दिखाना जरूरी होता है, जो पीड़ित के लिए असहनीय हो।

अदालत ने कहा कि छोटी-मोटी नोकझोंक, वैवाहिक विवाद या कुछ समय तक संवाद न होना सामान्य वैवाहिक जीवन का हिस्सा हो सकता है। ऐसे मामलों को सीधे तौर पर आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

इसे भी देखें – Rewa Medical College में ननकी देवी वर्मा का देहदान, शिक्षा और मानव सेवा की अनुपम मिसाल

साथ रहने के दौरान नहीं लगा कोई आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि शादी के बाद जब तक दंपति साथ रहे, उस दौरान किसी प्रकार की क्रूरता या उत्पीड़न का आरोप नहीं लगाया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 2 नवंबर 2014 को हुई थी और 29 नवंबर 2014 को जयेश काम के सिलसिले में मस्कट चले गए थे।

अदालत ने कहा कि इस अवधि के दौरान पति द्वारा किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या क्रूरता का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। इसलिए केवल 13 दिनों तक बातचीत न करने के आधार पर पति को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

महत्वपूर्ण कानूनी संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य मतभेदों को आपराधिक क्रूरता का रूप नहीं दिया जा सकता, जब तक कि लगातार मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न के ठोस प्रमाण मौजूद न हों।

इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जयेश कन्नन को सभी आरोपों से बरी कर दिया और निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया।

Share on social media

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *