संघ की शताब्दी यात्रा : राष्ट्र जागरण की सौ वर्ष की साधना: हित की शताब्दी यात्रा : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर के मोहिते बाड़ा में हुई थी। डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन आज 100 वर्ष की वैचारिक यात्रा पूरी कर रहा है। छोटे से बीज के रूप में शुरू हुआ संघ आज विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।
संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक समाज को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया। शिक्षा के क्षेत्र में 1952 में विद्या भारती की स्थापना हुई, जो आज विश्व का सबसे बड़ा अशासकीय शैक्षणिक संगठन है। इसी तरह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, सेवा भारती और संस्कार भारती जैसे कई संगठनों का निर्माण भी संघ की प्रेरणा से हुआ।
महिलाओं की भूमिका को महत्व देते हुए 1936 में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की गई। आज विचार परिवार के संगठनों में महिला नेतृत्व की सशक्त उपस्थिति दिखाई देती है। राजनीति के क्षेत्र में भी जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक संघ की विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। धारा 370 की समाप्ति, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना इसी विचारधारा की उपलब्धियां हैं।
संघ की यात्रा चुनौतियों से भरी रही। गांधी हत्या के मिथ्या आरोप, प्रतिबंध, आपातकाल की यातनाओं सहित कई कठिनाइयों का सामना करते हुए भी संगठन अपने संकल्पों पर अडिग रहा। शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास कर राष्ट्र सेवा का संस्कार दिया गया।
सेवा कार्यों में संघ का योगदान उल्लेखनीय रहा है। भूकंप, बाढ़, कोरोना महामारी जैसी आपदाओं के समय स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा में जुटे। स्वतंत्रता संग्राम, गोवा मुक्ति आंदोलन, कश्मीर में विलय और चीन के आक्रमण जैसे ऐतिहासिक क्षणों में भी संघ की सक्रिय भूमिका रही।
शताब्दी वर्ष पर संघ “पंच परिवर्तन” के माध्यम से स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन और नागरिक कर्तव्यों को जन-जन तक पहुंचा रहा है। इस अवसर पर संघ किसी भव्य आयोजन की बजाय प्रत्येक नागरिक तक पहुंचकर राष्ट्रधर्म की चेतना जगाने का कार्य कर रहा है।
2026 में शताब्दी वर्ष पूर्ण होने पर संघ का ध्येय यही रहेगा कि भारत विश्वगुरु के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो।













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