मऊगंज जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो सिस्टम की संवेदनहीनता और भू-माफियाओं की अत्याचार दोनों को बयां करती है। हर्रहा गांव में अवैध खनन और क्रेशर माफियाओं के आतंक से तंग आकर आदिवासी और गोंड समुदाय के लोग अब अपने ही गांव छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं।
मऊगंज जिले के हर्रहा गांव की यह तस्वीर अब पूरे प्रदेश के लिए सवाल बन गई है।जहां अवैध खनन माफिया खुलेआम शासन कर रहे हैं और प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है।गांव के आदिवासी और गोंड समुदाय की जमीनें, जो कलेक्टर की अनुमति के बिना बेची भी नहीं जा सकतीं —
उन्हीं जमीनों पर चल रहे हैं अवैध क्रशर और खदानें।कई बार शिकायत हुई, लेकिन नतीजा क्या निकला?फर्जी मुकदमे!वो भी उन्हीं ग्रामीणों पर, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। महिलाओं ने भी अधिकारियों के सामने खुलकर आरोप लगाए —कहा, “हमारे घर तक खोद डाले गए हैं, धूल उड़ती है, बच्चे बीमार हैं,लेकिन अधिकारी कहते हैं — पानी डलवा देंगे! और फिर कभी लौटकर नहीं आते।
हद तो तब हो गई, जब ग्रामीणों ने सुनवाई के दौरान ही अपर कलेक्टर और खनिज विभाग के अधिकारियों के सामने उन पर पैसे लेने और भ्रष्टाचार के आरोप जड़ दिए।इतना गुस्सा कि एक महिला ने कहा —अब अगर हमारे घर खोदे तो हम भी उनके घर खोद देंगे!आपको बता दे कि अवैध ब्लास्टिंग से घरों में दरारें,धूल से फैलते रोग,और हर रोज़ का डर —ये है हर्रहा गांव का सच!ग्रामीणों का कहना है —बाउंड्री नहीं, वृक्षारोपण नहीं, पानी का इंतज़ाम नहीं…सिर्फ़ मुनाफे की मशीनें चल रही हैं!वही गांव के पीड़ित ब्रजेंद्र द्विवेदी बताते हैं —जो आवाज उठाता है, उसे एससी/एसटी एक्ट में फंसा दिया जाता है,मेरी संपत्ति छीन ली गई, केस लड़ते-लड़ते सब कुछ चला गया।
ग्रामीणों का कहना है कि हमने स्वयं खदानों में जाकर मशीनें बंद कराईं,डायल 112 पर कॉल किया, लेकिन आरोप है —माइनिंग प्रभारी का नंबर बंद था!जब मदद चाहिए थी, अधिकारी गायब थे।यह सिर्फ हर्रहा की कहानी नहीं…यह उस सिस्टम की पोल खोलती है,जहां पीड़ितों के अनुसार न्याय बिकता है और आम आदमी फंसता है















Leave a Reply