रीवा जिले की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं।
जहां एक ओर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला रीवा की स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में जुटे हैं…
वहीं दूसरी ओर विभाग के कुछ अधिकारी और चिकित्सक सिस्टम को बीमार कर रहे हैं।”
रीवा के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल और संजय गांधी अस्पताल में एक महीने पहले एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों का भव्य उद्घाटन हुआ था।
उपमुख्यमंत्री ने खुद इसे जनता को समर्पित किया था।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि आज तक ये मशीनें चालू नहीं हुईं।”
मरीज रोजाना जांच कराने आते हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है।
अस्पताल प्रबंधन ने अब तक जांच में लगने वाली फिल्म तक की व्यवस्था नहीं की है।
कंपनी की सैंपल फिल्म से काम चलाया जा रहा है।
ज़िम्मेदारी के सवाल पर सबकी नजर मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल पर टिक गई है।”
वहीं दूसरी ओर, रीवा मेडिकल कॉलेज का गायनी विभाग मानो विवादों का अड्डा बन गया है।
यहां लगातार तीन डॉक्टर — डॉ. सरिता सिंह, डॉ. पूजा गंगवार, और डॉ. कल्पना यादव — इस्तीफा दे चुकी हैं।
जबकि डॉ. पद्मा शुक्ला छुट्टी पर चली गई हैं।”
इन सभी डॉक्टरों ने अपने त्यागपत्र में विभागाध्यक्ष डॉ. बीनू कुशवाह पर मानसिक प्रताड़ना, तानाशाही रवैये और अनुशासनहीनता के गंभीर आरोप लगाए हैं।
डॉक्टरों ने स्वास्थ्य मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि विभाग का वातावरण तनावपूर्ण और अव्यवस्थित हो गया है।”
वरिष्ठ डॉक्टरों से ऊँची आवाज़ में बात करना और सार्वजनिक रूप से अपमानित करना।
विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप में अपमानजनक भाषा का प्रयोग।
स्टाफ को नौकरी से निकालने की धमकी देना।
तीन वर्षों में कोई सफल शल्यक्रिया नहीं करना।
विभागीय फंड में अनियमितता और अवैध वसूली के आरोप।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब डॉक्टरों के इस्तीफे और गंभीर आरोप सामने आ चुके हैं — तो विभाग अब तक खामोश क्यों है?
क्या प्रशासन किसी बड़ी गड़बड़ी को दबाने की कोशिश कर रहा है?”
अब तक विभाग की ओर से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
जबकि लगातार इस्तीफे और विवादों से मरीजों की सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।”
वही डीन से जब जानकारी चाही गई तो डीन कभी मीटिंग तो कभी समय नहीं है का बहाना देकर मामले को टालते नजर आए।
जब मशीनें हैं, डॉक्टर हैं, बजट है… तो इलाज क्यों नहीं?
क्या स्वास्थ्य मंत्री के शहर में ही स्वास्थ्य व्यवस्था ‘बीमार’ हो चुकी है?
यह सवाल अब सिर्फ रीवा का नहीं, पूरे प्रदेश का है।”















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