शहडोल । जिले के शिक्षा विभाग में हाल के आदेशों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि- क्या विभाग में नियम किताबों में कुछ और, और दफ्तरों में कुछ और चल रहे हैं? लोगों का कहना है ‘यहाँ तो हालात ऐसे दिख रहे हैं। चेहरे पर नियम, और हाथ में मनमानी। शुरुआत जनसुनवाई से नरेंद्र कुमार मिश्र ने जनसुनवाई शिकायत क्रमांक 33157638 शहडोल कमिश्नर के माध्यम से निवेदन किया कि उन्हें वरिष्ठता के आधार पर शासकीय हाई स्कूल बुड़वा का प्रभारी प्राचार्य बनाया जाए। लेकिन प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी फूल सिंह मारपाची ने लिखित जवाब में कहा नरेंद्र कुमार मिश्र संलग्न है, इसलिए इन्हें प्रभार नहीं दिया जा सकता। प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी फूल सिंह मारपाची की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि विभाग में पहले से ही उनके खिलाफ कई वित्तीय अनियमितताओं और कथित घोटालों को लेकर चर्चाएँ वर्षों से चलती रही हैं। लोगों का कहना है कि- जहाँ पहले से ही निर्णयों पर पैसे और प्रभाव की परछाई रही हो, वहाँ निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जाए?’ यानी विभाग की परिभाषा संलग्न प्राचार्य प्रभार नहीं यहाँ तक तो मान लिया जाता. पर असली खेल इसके बाद सामने आया। वही जब दूसरी ओर विभाग, वही नियम और उलटा फैसला 26/11/2025 के आदेश में रवि कुमार द्विवेदी, जो ब्यौहारी से खड़हुली पहुंचे, उन्हें तत्काल प्रभाव से प्रभारी प्राचार्य बना दिया गया।
क्या इस निर्णय में निजी रंजिश का जहर घोला गया
सूत्रों के मुताबिक, लिपिक संतोष कुमार मिश्रा और शिक्षक नरेंद्र कुमार मिश्र के बीच पुरानी द्वेष-रजिश वर्षों से विभाग में चर्चा का विषय रही है। इसी रंजिश के चलते, प्रभार रोकना, फाइलों में वेतन अटकाना। दोनों को ‘अंदरखाने की साजिश माना जा रहा है। सूत्र याद दिलाते हैं कि यही नेटवर्क पहले भी संविलियन घोटाले और लाखों के बिल-फर्जीवाड़े में सवालों के घेरे में रहा है। जिन पर जांच बैठनी चाहिए थी, वही अब फिर से फाइलों पर नियमों का ताला’ लगा रहे हैं। कुछ अधिकारियों की जुबान पर यह सवाल गूंज रहा है- ‘क्या एक लिपिक ने कानून को जेब में रखकर, फाइलों को हथियार की तरह चलाया?’ जब सरकारी नौकर संतोष कुमार मिश्रा दफ्तर को निजी अखाड़ा बना दें, तो शिक्षा व्यवस्था का पहिया कैसे चलेगा? अब यही बात लोगों के गले नहीं उतर रही।














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