अरावली पर्वत श्रृंखला, जो उत्तर भारत की जीवनरेखा मानी जाती है, आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। अवैध खनन, बेतरतीब शहरीकरण, हाईवे-टाउनशिप परियोजनाएं और औद्योगिक विस्तार ने अरावली को छलनी कर दिया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान और हरियाणा का बड़ा हिस्सा भीषण पर्यावरण संकट की चपेट में आ सकता है।
अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि यह रेगिस्तान के विस्तार को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। यह भूजल recharge का बड़ा स्रोत है और हजारों वनस्पतियों व वन्यजीवों का घर है। लेकिन आज पहाड़ों को काटकर पत्थर, बजरी और रेत निकाली जा रही है। कई इलाकों में सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के आदेशों के बावजूद खनन जारी है, जिस पर प्रशासन की चुप्पी सवाल खड़े कर रही है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अरावली के नष्ट होने से तापमान में तेज़ बढ़ोतरी, पानी की किल्लत और प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाएगा। दिल्ली-एनसीआर पहले ही गंभीर वायु प्रदूषण से जूझ रहा है और अरावली का कमजोर होना इस संकट को और गहरा कर देगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब प्रकृति का बलिदान है? या फिर समय रहते सख़्त फैसले लेकर अरावली को बचाया जा सकता है? अब ज़रूरत है काग़ज़ी कानूनों से आगे बढ़कर ज़मीनी कार्रवाई की, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ अरावली की तस्वीरें नहीं, बल्कि ज़िंदा पहाड़ मिल सकें।
अरावली पर संकट: अवैध खनन और बेतरतीब विकास से उत्तर भारत की जीवनरेखा खतरे में














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