देश में जब भी किसी महिला या बेटी के साथ दर्दनाक घटना होती है, पूरा सिस्टम अचानक सक्रिय दिखाई देने लगता है। नेताओं के बयान आते हैं, सोशल मीडिया पर संवेदनाएं जताई जाती हैं और सरकारें महिला सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताने लगती हैं। लेकिन हर घटना के बाद वही सवाल फिर उठता है — अगर सुरक्षा सच में प्राथमिकता है, तो बेटियां आज भी डर में क्यों जी रही हैं?
महिला सुरक्षा: निर्भया के बाद भी नहीं बदले हालात
निर्भया कांड के बाद देशभर में आक्रोश देखने को मिला था। लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए गए। सरकारों ने बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन वर्षों बाद भी हाथरस कांड, कोलकाता महिला डॉक्टर हत्याकांड जैसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि हालात पूरी तरह नहीं बदले।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़े भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। हर साल महिलाओं के खिलाफ अपराधों के हजारों मामले दर्ज हो रहे हैं। दुष्कर्म, छेड़छाड़ और घरेलू हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर सिस्टम में कमी कहां है?
महिला सुरक्षा: पीड़िता पर ही उठते हैं सवाल
कई मामलों में पीड़िता को न्याय पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। एफआईआर दर्ज कराने से लेकर अदालत तक उसे संघर्ष करना पड़ता है। सबसे दुखद बात यह है कि अपराधी से पहले समाज अक्सर पीड़िता पर सवाल खड़े करता है — “इतनी रात में बाहर क्यों थीं?”, “वहां गई ही क्यों थीं?”
महिला सुरक्षा: प्रचार ज्यादा, भरोसा कम
सरकारें महिला सुरक्षा के प्रचार पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जमीन पर कई महिलाएं आज भी खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। एक लड़की रात में अकेले सफर करते समय पुलिस हेल्पलाइन से ज्यादा अपने परिवार को फोन करना सुरक्षित समझती है।
महिला सुरक्षा: प्रचार ज्यादा, भरोसा कम
हर बड़ी घटना के बाद पुलिस कार्रवाई, नेताओं के दौरे और मीडिया बहस शुरू हो जाती है। कुछ दिनों तक सख्ती दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है। हालांकि पीड़ित परिवार का दर्द और समाज का डर खत्म नहीं होता।
महिला सुरक्षा: समाज की सोच बदलना भी जरूरी
महिला सुरक्षा सिर्फ कानून का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच का भी मुद्दा है। जब तक महिलाओं को बराबरी और सम्मान की नजर से नहीं देखा जाएगा, तब तक सिर्फ कानून और सरकारी दावे हालात नहीं बदल पाएंगे।
महिला सुरक्षा: सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम
सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या सरकारें सच में महिलाओं को सुरक्षित बनाना चाहती हैं या महिला सुरक्षा सिर्फ राजनीतिक मुद्दा बनकर रह गई है?
क्योंकि जिस दिन देश की हर बेटी बिना डर के घर से बाहर निकल पाएगी, उसी दिन महिला सुरक्षा के दावे सच साबित होंगे।
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