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अक्षय तृतीया का महत्व: क्यों मनाया जाता है यह पावन पर्व

अक्षय तृतीया का महत्व: अक्षय तृतीया हिंदू धर्म का एक अत्यंत शुभ और पवित्र दिन माना जाता है। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। “अक्षय” का अर्थ होता है – जो कभी समाप्त न हो, यानी इस दिन किया गया पुण्य, दान, जप और शुभ कार्य अनंत फल देने वाला माना जाता है।

अक्षय तृतीया का महत्व: अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है?

अक्षय तृतीया का महत्व: अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है? 

अक्षय तृतीया को “अबूझ मुहूर्त” भी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि इस दिन किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करना, जमीन खरीदना या सोना-चांदी खरीदना—इन सभी कार्यों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-धान्य और सौभाग्य की वृद्धि होती है। कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और जरूरतमंदों को दान देकर पुण्य अर्जित करते हैं।

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अक्षय तृतीया का महत्व: इस दिन कई महत्वपूर्ण धार्मिक और पौराणिक घटनाएं हुई मानी जाती हैं। 

नीचे विस्तार से समझिए कि अक्षय तृतीया के दिन क्या-क्या हुआ था..

1. भगवान परशुराम का जन्म

2. गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण

3. महाभारत की रचना का आरंभ

4. अक्षय पात्र की प्राप्ति

5. त्रेता युग की शुरुआत

परशुराम जयंती हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

भगवान परशुराम

अक्षय तृतीया का महत्व: परशुराम जयंती: भगवान परशुराम का अवतार दिवस

परशुराम जयंती हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है, जो अक्सर अक्षय तृतीया के दिन ही पड़ता है। इस कारण इस दिन का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

भगवान परशुराम कौन थे? 

भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। वे एक ब्राह्मण कुल में जन्मे, लेकिन उन्होंने क्षत्रिय धर्म के अनुसार शस्त्र उठाकर अन्याय और अधर्म के खिलाफ संघर्ष किया। उनके हाथ में हमेशा फरसा (कुल्हाड़ी) रहता था, इसी कारण उनका नाम “परशु” (फरसा) + “राम” पड़ा।

उन्हें भगवान विष्णु का क्रोध स्वरूप माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी से अत्याचारी और अधर्मी क्षत्रियों का नाश किया था। पौराणिक मान्यता के अनुसार उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय अत्याचार से मुक्त कराया।

परशुराम जयंती क्यों मनाई जाती है? 

परशुराम जयंती का मुख्य उद्देश्य धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के संदेश को याद करना है। यह दिन हमें सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ खड़े होना और सत्य के मार्ग पर चलना कितना आवश्यक है।

इस दिन विशेष रूप से ब्राह्मण समाज भगवान परशुराम की पूजा करता है और उन्हें अपना आदर्श मानता है। हालांकि, अब यह पर्व सभी समुदायों द्वारा श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण: भगीरथ की तपस्या

गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण

गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण

गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण: भगीरथ की तपस्या

गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण हिंदू धर्म की सबसे पवित्र और प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। यह घटना केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि भक्ति, तपस्या और संकल्प की शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि गंगा का अवतरण वैशाख शुक्ल तृतीया यानी अक्षय तृतीया के दिन हुआ था।

गंगा अवतरण की कथा 

प्राचीन समय में राजा सगर ने एक विशाल यज्ञ किया था। यज्ञ के दौरान उनका घोड़ा इंद्र देव द्वारा चुरा लिया गया और कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया गया। जब सगर के 60,000 पुत्र घोड़े की खोज में वहां पहुंचे, तो उन्होंने कपिल मुनि पर आरोप लगाया। इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपने तप के बल से सभी पुत्रों को भस्म कर दिया।

उनकी आत्माओं की मुक्ति के लिए आवश्यक था कि स्वर्ग से गंगा नदी पृथ्वी पर आए और उनके अस्थियों को स्पर्श करे। कई पीढ़ियों तक यह कार्य अधूरा रहा, अंततः राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या कर गंगा को पृथ्वी पर लाने का संकल्प लिया।

भगीरथ की कठोर तपस्या 

राजा भगीरथ ने वर्षों तक तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर आने की अनुमति तो दी, लेकिन एक समस्या थी—गंगा का वेग इतना तेज था कि वह सीधे पृथ्वी पर गिरकर सब कुछ नष्ट कर सकती थीं।

महाभारत का लेखन और अक्षय पात्र

महाभारत कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी ने इसी दिन गणेश जी को महाभारत सुनाना और लिखवाना शुरू किया था.
साथ ही, वनवास के दौरान भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को अक्षय पात्र इसी दिन भेंट किया था, जिससे पांडवों के पास भोजन की कभी कमी नहीं हुई |

सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ

मत्स्य पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया ही वह दिन है, जब समय चक्र बदला और सतयुग और त्रेतायुग की शुरुवात हुई |
इसीलिए इसे ‘कृतयुगादि’ तिथि भी कहते है इस दिन किया गया कोई भी आध्यात्मिक काम अक्षय फल देता है, क्योकिं इसकी शुभता सीधे युग परिवर्तन से जुडी है |

 

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