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Uproar over cockroach comment: प्रियंका चतुर्वेदी ने CJI सूर्यकांत पर साधा निशाना

Uproar over cockroach comment: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की वकिलों और बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी पर अब सियासत तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने बिना नाम लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों को अहंकारी बताया। प्रियंका चतुर्वेदी ने जजों को असहनशील तक बता दिया। इस सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत वकीलों पर भड़क गए थे।

Uproar over cockroach comment: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से बढ़ा विवाद 

Uproar over cockroach comment

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर देश में नया राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। जूनियर वकीलों और बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई उनकी टिप्पणी पर अब विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है। खासतौर पर प्रियंका चतुर्वेदी ने बिना नाम लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला उस समय शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील का दर्जा पाने से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कुछ ऐसी टिप्पणियां कर दीं, जिन्हें लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई।

Uproar over cockroach comment: क्या बोले थे CJI सूर्यकांत?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कई युवा वकील पेशे में जगह न मिलने के कारण निराश हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग “तिलचट्टों की तरह” हर जगह फैल जाते हैं और फिर मीडिया, सोशल मीडिया, आरटीआई एक्टिविज्म या दूसरे मंचों के जरिए हर संस्था पर हमला करने लगते हैं।

सीजेआई की इस टिप्पणी को लेकर कई लोगों ने इसे अपमानजनक बताया। आलोचकों का कहना है कि देश में पहले से ही बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है और ऐसे समय में युवाओं की तुलना “कॉकरोच” या “परजीवी” जैसे शब्दों से करना उचित नहीं माना जा सकता।

हालांकि कोर्ट की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि न्यायपालिका की गरिमा और वरिष्ठ वकील के दर्जे की गंभीरता बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि “सीनियर एडवोकेट” का दर्जा कोई सजावटी उपाधि नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी और पेशेवर योग्यता का प्रतीक है।

Uproar over cockroach comment: प्रियंका चतुर्वेदी का तीखा पलटवार

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प्रियंका चतुर्वेदी ने इस पूरे मामले पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा पोस्ट लिखते हुए न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने सीधे तौर पर CJI का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी को “घोर अहंकार” बताया।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि कई संवैधानिक महत्व के मामलों में वर्षों तक फैसला नहीं आता, लेकिन जब कोई इस देरी पर सवाल उठाता है तो उसे “तुच्छ राजनेता” या “कार्यकर्ता” कह दिया जाता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करने वाले युवाओं को “तिलचट्टे और परजीवी” कहना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

उन्होंने आगे लिखा कि इस तरह की टिप्पणियां यह दिखाती हैं कि न्यायपालिका आलोचना को सहन करने में असहज महसूस करती है। हालांकि अपने पोस्ट के अंत में उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनका बयान “भारत की माननीय न्यायपालिका के प्रति पूरे सम्मान के साथ” है।

वरिष्ठ वकील का दर्जा क्या होता है?

भारत में “सीनियर एडवोकेट” का दर्जा कानूनी पेशे में बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट किसी वकील की योग्यता, अनुभव और कानूनी योगदान को देखते हुए यह दर्जा प्रदान करते हैं।

याचिकाकर्ता वकीलों की मांग थी कि उन्हें वरिष्ठ वकील का दर्जा दिए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता हो और उनके आवेदन पर उचित तरीके से विचार किया जाए। इसी दौरान कोर्ट ने कुछ वकीलों द्वारा सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों और पोस्टों पर नाराजगी जताई।

अदालत का कहना था कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने या सोशल मीडिया अभियान चलाने से किसी को विशेष दर्जा नहीं मिल सकता।

सोशल मीडिया पर बंटी राय

इस पूरे विवाद के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा नजर आया। एक पक्ष का कहना है कि सीजेआई की टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया जा रहा है और उनका मकसद केवल पेशे की गिरती गंभीरता पर चिंता जताना था।

वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति को शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करना चाहिए। लोगों का कहना है कि युवा वकीलों और बेरोजगारों की स्थिति पहले ही कठिन है, ऐसे में इस तरह की भाषा उन्हें और आहत कर सकती है।

कई कानूनी विशेषज्ञों ने भी कहा कि न्यायपालिका और जनता के बीच भरोसा बनाए रखने के लिए संवाद की भाषा संतुलित होनी चाहिए।

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न्यायपालिका बनाम राजनीति की नई बहस

यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे न्यायपालिका और राजनीतिक वर्ग के बीच तनाव की बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दल लगातार अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में देरी को मुद्दा बना रहे हैं। दूसरी ओर न्यायपालिका का मानना है कि अदालतों पर अनावश्यक राजनीतिक दबाव बनाया जाता है।

अब देखना होगा कि यह मामला आगे कितना तूल पकड़ता है और क्या सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस टिप्पणी पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण आता है या नहीं। फिलहाल, सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी और प्रियंका चतुर्वेदी के पलटवार ने देश में न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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