AI Data Center Water Consumption: Explained: AI की बढ़ती प्यास! डेटा सेंटर आखिर कितना पानी पी जाते हैं और क्यों बढ़ रही है चिंता?

AI Data Center Water Consumption:
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। मौसम जानने से लेकर ईमेल लिखने, फोटो बनाने और सवालों के जवाब पाने तक, AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि AI से पूछा गया एक छोटा-सा सवाल भी पर्यावरण पर असर डाल सकता है? इसकी सबसे बड़ी वजह है डेटा सेंटर, जिन्हें ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है।
AI Data Center Water Consumption: डेटा सेंटर को इतनी ज्यादा पानी की जरूरत क्यों पड़ती है?
डेटा सेंटर हजारों हाई-परफॉर्मेंस सर्वरों से भरे विशाल परिसर होते हैं। ये सर्वर 24 घंटे लगातार काम करते हैं और बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं। यदि इन्हें समय पर ठंडा नहीं किया जाए तो मशीनें खराब हो सकती हैं। इसलिए कूलिंग सिस्टम में पानी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। कई जगह बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले थर्मल प्लांट भी अप्रत्यक्ष रूप से पानी की खपत बढ़ाते हैं।
AI Data Center Water Consumption: एक डेटा सेंटर रोज कितना पानी खर्च करता है?

AI Data Center Water Consumption:
अमेरिकी संस्था Environmental and Energy Study Institute (EESI) के अनुसार, 100 मेगावाट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 1.1 करोड़ से 1.9 करोड़ लीटर पानी खर्च कर सकता है।
इसे आसान भाषा में समझें:
- एक व्यक्ति को पीने के लिए प्रतिदिन लगभग 3 से 4 लीटर पानी चाहिए।
- एक 100 मेगावाट डेटा सेंटर का एक दिन का पानी करीब 30 से 50 लाख लोगों की एक दिन की पीने की जरूरत के बराबर हो सकता है।
AI Data Center Water Consumption: Google और Microsoft की पानी खपत

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दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों के डेटा सेंटर भी पानी की भारी खपत करते हैं।
Google की 2023 पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने अपने डेटा सेंटरों और कार्यालयों में लगभग 5.6 अरब गैलन (करीब 21,200 करोड़ लीटर) पानी का उपयोग किया। अमेरिका के द डल्स स्थित एक डेटा सेंटर ने अकेले प्रतिदिन करीब 57 लाख लीटर पानी खर्च किया।
वहीं Microsoft के एरिजोना स्थित डेटा सेंटर ने वर्ष 2022 में 5.6 करोड़ लीटर से अधिक पानी इस्तेमाल किया, जबकि वह क्षेत्र पहले से ही सूखे की समस्या से जूझ रहा था।
AI Data Center Water Consumption: खेती से तुलना करें तो तस्वीर और स्पष्ट होगी
भारत में एक एकड़ गेहूं की पूरी फसल तैयार करने में लगभग 20 से 25 लाख लीटर पानी लगता है।
यदि किसी डेटा सेंटर की रोजाना पानी की खपत 57 लाख लीटर है, तो यह लगभग ढाई एकड़ गेहूं की पूरी फसल की सिंचाई के बराबर पानी प्रतिदिन इस्तेमाल करता है।
AI Data Center Water Consumption: AI से सवाल पूछने में कितना पानी लगता है?
कुछ शोधों के अनुसार, GPT-4 जैसे बड़े AI मॉडल को ट्रेन करने में लगभग 70 लाख लीटर ताजा पानी की आवश्यकता पड़ी। वहीं AI चैटबॉट से लगभग 10 से 50 सवाल पूछने पर कुल मिलाकर लगभग आधा लीटर पानी के बराबर कूलिंग संसाधनों की खपत हो सकती है। वास्तविक मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि मॉडल कहां और कैसे चल रहा है।
AI Data Center Water Consumption: भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं डेटा सेंटर
NASSCOM के अनुसार, भारत में डेटा सेंटर क्षमता 2024 में 950 मेगावाट थी, जो 2026 तक 1700 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान है।
यदि औसत अनुमान लगाया जाए तो:
- 2024 में भारतीय डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 14 करोड़ लीटर पानी खर्च कर रहे थे।
- 2026 तक यह खपत 25 करोड़ लीटर प्रतिदिन से अधिक हो सकती है।
यह मात्रा करोड़ों लोगों की दैनिक पेयजल आवश्यकता के बराबर हो सकती है।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत में अधिकांश नए डेटा सेंटर मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में बन रहे हैं, जहां पहले से ही पानी की उपलब्धता चुनौती बनी हुई है। ऐसे में AI और क्लाउड सेवाओं के बढ़ते उपयोग के साथ जल संसाधनों पर दबाव भी बढ़ सकता है।
AI Data Center Water Consumption: समाधान क्या हो सकता है?
तकनीकी कंपनियां अब पानी की खपत कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रही हैं। इनमें शामिल हैं:
- एयर कूलिंग सिस्टम
- लिक्विड इमर्शन कूलिंग
- रिसाइकल किए गए पानी का उपयोग
- समुद्री पानी आधारित कूलिंग
- 2030 तक “Water Positive” बनने की योजनाएं, यानी जितना पानी उपयोग करें उससे अधिक पानी पर्यावरण को वापस लौटाना।
AI तकनीक हमारे जीवन को आसान बना रही है, लेकिन इसके पीछे ऊर्जा और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी खपत भी छिपी हुई है। आने वाले समय में AI के विकास के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि डेटा सेंटर अधिक ऊर्जा और जल-कुशल तकनीकों का उपयोग करें। तकनीक और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना ही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी।













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