CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: ‘मनी लॉन्ड्रिंग के पैसे से दुनिया के 8 अरब लोगों को मिल सकता है लैपटॉप’, सिर्फ 1% रकम होती है रिकवर
नई दिल्ली। मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों से निपटने की चुनौती को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में हर साल मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इतनी बड़ी रकम को अवैध तरीके से इधर-उधर किया जाता है कि अगर उस पैसे को सामान्य लैपटॉप खरीदने में लगाया जाए, तो दुनिया की करीब 8 अरब आबादी में हर व्यक्ति के लिए एक लैपटॉप खरीदा जा सकता है और इसके बाद भी पैसा बच सकता है।

CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान:
जस्टिस सूर्यकांत ने यह बात 29 अगस्त को कैंब्रिज में आयोजित 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम ऑन इकोनॉमिक क्राइम में कही। आर्थिक अपराधों पर चर्चा करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल अपराधियों को पकड़ना ही पर्याप्त नहीं है। अपराध से कमाए गए पैसे का पता लगाना, उसे फ्रीज करना और फिर उसे वापस हासिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: मनी लॉन्ड्रिंग की रकम पर CJI ने जताई चिंता

CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान:
जस्टिस सूर्यकांत के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए हर साल इतनी बड़ी रकम को सफेद करने की कोशिश होती है कि उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। उन्होंने इसे समझाने के लिए दुनिया की आबादी और लैपटॉप की कीमत का उदाहरण दिया।
उनका कहना था कि यदि मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी वैश्विक रकम के अनुमान को मोटे तौर पर भी सही माना जाए, तो यह राशि इतनी बड़ी है कि इससे दुनिया में मौजूद करीब 8 अरब लोगों में से हर व्यक्ति के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सकता है। यह उदाहरण आर्थिक अपराधों के पैमाने को समझाने के लिए दिया गया।
CJI ने इस दौरान एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अवैध तरीके से कमाए गए पैसे का बड़ा हिस्सा वापस हासिल नहीं हो पाता। उनके मुताबिक, बहुत मोटे अनुमान के आधार पर भी अवैध संपत्ति का सिर्फ करीब 1 प्रतिशत हिस्सा ही रिकवर किया जा पाता है।
यानी अगर अवैध तरीके से हासिल की गई संपत्ति को 100 हिस्सों में बांटा जाए, तो उसमें से केवल एक हिस्सा ही वास्तविक रूप से वापस हासिल हो पाता है, जबकि बाकी 99 हिस्से अक्सर भाषणों और रिपोर्टों में चर्चा का विषय बनकर रह जाते हैं।
CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: अपराध से ज्यादा जरूरी है पैसे का पीछा करना
जस्टिस सूर्यकांत ने आर्थिक अपराधों से लड़ाई की रणनीति पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों और संबंधित संस्थाओं का ध्यान केवल अपराधी तक पहुंचने पर नहीं होना चाहिए, बल्कि अपराध से पैदा हुई संपत्ति का पता लगाने पर भी होना चाहिए।
आर्थिक अपराधों में पैसा कई स्तरों और अलग-अलग माध्यमों से घुमाया जा सकता है। ऐसे में उसकी वास्तविक स्थिति का पता लगाना चुनौतीपूर्ण होता है। यही वजह है कि अपराध से हासिल रकम को जल्द से जल्द पहचानना, फ्रीज करना और कानूनी प्रक्रिया के जरिए वापस हासिल करना जरूरी है।
CJI के बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि ‘Follow the money’ यानी पैसे का पीछा करना आर्थिक अपराधों की जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए।
दुनिया की पहली वित्तीय धोखाधड़ी का भी किया जिक्र
अपने संबोधन के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने वित्तीय अपराधों के इतिहास का भी उदाहरण दिया। उन्होंने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी व्यापारी हेगेस्त्राटोस की कहानी सुनाई।
बताया जाता है कि हेगेस्त्राटोस ने बीमा की रकम हासिल करने के लिए अपने ही जहाज को जानबूझकर डुबोने की योजना बनाई थी। इस घटना को वित्तीय धोखाधड़ी के शुरुआती उदाहरणों में गिना जाता है।
इस उदाहरण के जरिए CJI ने यह समझाने की कोशिश की कि आर्थिक अपराध कोई नई समस्या नहीं है। समय के साथ अपराध करने के तरीके बदलते गए, लेकिन आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए धोखाधड़ी और गलत तरीकों का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है।
CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: चाणक्य के अर्थशास्त्र का भी किया उल्लेख
जस्टिस सूर्यकांत ने अपने भाषण में भारत के प्राचीन ग्रंथ अर्थशास्त्र का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सरकारी अधिकारियों द्वारा राजस्व की चोरी करने के करीब 40 तरीकों की पहचान की गई थी।
उनके मुताबिक, प्राचीन भारत में भी आर्थिक अपराधों की पहचान और उनसे निपटने के तरीकों पर गंभीरता से विचार किया गया था।
उन्होंने एक दिलचस्प सुझाव भी सामने रखा। CJI ने कहा कि अर्थशास्त्र में अधिकारियों द्वारा चोरी के जिन 40 तरीकों का उल्लेख है, उनके साथ आज के संदर्भ में चोरी किए गए पैसे का पता लगाने, उसे फ्रीज करने और वापस हासिल करने के 40 तरीकों की जानकारी भी जोड़ी जानी चाहिए।
CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: सिर्फ भाषण और रिपोर्ट काफी नहीं
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अवैध संपत्ति की बरामदगी के मामले में सिर्फ चर्चा, भाषण और रिपोर्ट पर्याप्त नहीं हैं। असली चुनौती यह है कि अवैध तरीके से कमाई गई संपत्ति को वास्तविक रूप से वापस लाया जाए।
उनके मुताबिक, अगर अपराध से कमाए गए पैसे को वापस हासिल करने की क्षमता मजबूत नहीं होगी, तो आर्थिक अपराध करने वालों पर अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मनी लॉन्ड्रिंग का असर सिर्फ वित्तीय व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। इससे भ्रष्टाचार, संगठित अपराध और दूसरे आर्थिक अपराधों को बढ़ावा मिल सकता है। इसलिए अवैध संपत्ति की पहचान और उसकी रिकवरी आर्थिक अपराधों से लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान: भारत के लिए भी अहम है मुद्दा
भारत में भी काले धन और मनी लॉन्ड्रिंग का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। अलग-अलग मामलों में जांच एजेंसियां अवैध संपत्ति और मनी ट्रेल का पता लगाने की कोशिश करती हैं। लेकिन जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी इस बात पर ध्यान खींचती है कि केवल कार्रवाई शुरू करना पर्याप्त नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि जांच की प्रक्रिया के साथ-साथ अवैध धन की पूरी श्रृंखला को समझा जाए और जहां संभव हो, उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत वापस हासिल किया जाए।
CJI सूर्यकांत का यह बयान आर्थिक अपराधों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में संपत्ति की रिकवरी को केंद्र में रखने की जरूरत को रेखांकित करता है। उनका लैपटॉप वाला उदाहरण यह बताने के लिए काफी है कि दुनिया में अवैध वित्तीय गतिविधियों का पैमाना कितना बड़ा हो सकता है और उसके मुकाबले वास्तविक रिकवरी कितनी कम है।

















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