पाकिस्तान को क्रेडिट, क्या भारत के लिए झटका?

क्या भारत के लिए झटका?
अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव के बाद हुए दो हफ्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान को मिल रही अंतरराष्ट्रीय सराहना ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह भारत की विदेश नीति के लिए झटका है या एक रणनीतिक संतुलन?
भारत का संतुलित रुख
भारत के विदेश मंत्रालय ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए साफ कहा कि “संवाद और कूटनीति ही स्थायी शांति का रास्ता है।”
भारत ने किसी भी देश, खासकर पाकिस्तान, का नाम लेने से परहेज किया और अपना फोकस क्षेत्रीय स्थिरता, तेल सप्लाई और वैश्विक व्यापार पर रखा।
होर्मुज़ स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री मार्ग की सुरक्षा भारत के लिए प्राथमिकता रही, क्योंकि इससे ऊर्जा आपूर्ति सीधे जुड़ी है।
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पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय सराहना

युद्धविराम के बाद कई वैश्विक नेताओं ने पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ की।
- Donald Trump ने अपने बयान में पाकिस्तान का जिक्र किया
- Shehbaz Sharif और Asim Munir के प्रयासों को सराहा गया
- ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने भी पाकिस्तान को धन्यवाद दिया
- Ursula von der Leyen सहित कई नेताओं ने मध्यस्थता की सराहना की
इससे पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर एक सक्रिय डिप्लोमैटिक प्लेयर के रूप में पेश होने का मौका मिला।
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विपक्ष का हमला: “भारत पीछे रह गया?”

विपक्ष का हमला
प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीज़फायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है.” “28 फ़रवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था.
ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं. इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया.” उन्होंने लिखा, “विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था. लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है.”
भारत में विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा।
- Jairam Ramesh ने इसे “पर्सनल स्टाइल डिप्लोमेसी की विफलता” बताया
- Rashid Alvi ने कहा कि भारत को यह भूमिका निभानी चाहिए थी
विपक्ष का आरोप है कि भारत के पास बेहतर कूटनीतिक स्थिति होने के बावजूद वह इस मौके का फायदा नहीं उठा सका।
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अलग राय: “यह भारत की लड़ाई नहीं थी”
हालांकि सभी नेता इस आलोचना से सहमत नहीं हैं।
- Priyanka Chaturvedi ने सवाल उठाया कि भारत को इस संघर्ष में क्यों शामिल होना चाहिए था
- Omar Abdullah ने भी युद्ध के नतीजों पर ही सवाल खड़े किए
उनका मानना है कि भारत का संयमित रुख ही सही रणनीति थी।
क्या पाकिस्तान सच में मध्यस्थ था?
विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
विदेश नीति विशेषज्ञ Harsh V. Pant के अनुसार,
पाकिस्तान की भूमिका “मध्यस्थ” से ज्यादा “मैसेज कैरियर” की रही है।
पूर्व विदेश सचिव Nirupama Rao भी मानती हैं कि:
- यह पारंपरिक मध्यस्थता नहीं थी
- बल्कि एक “डिप्लोमैटिक चैनल” के रूप में काम हुआ
भारत की रणनीति: संयम और संतुलन

विदेश मंत्री एस जयशंकर
भारत ने इस पूरे संकट में सावधानी से कदम बढ़ाए:
- अमेरिका के साथ ट्रेड डील बातचीत जारी थी
- ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापार संबंध महत्वपूर्ण हैं
- भारत ने दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखा
भारत ने चुपचाप अपने हित सुरक्षित किए, जैसे:
- तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही
- क्षेत्रीय स्थिरता पर फोकस
निष्कर्ष: झटका या रणनीतिक चुप्पी?
पाकिस्तान को मिल रही सराहना पहली नजर में भारत के लिए झटका लग सकती है, लेकिन पूरी तस्वीर अलग है।
- पाकिस्तान ने अल्पकालिक (short-term) कूटनीतिक लाभ हासिल किया
- भारत ने दीर्घकालिक (long-term) रणनीति और संतुलन बनाए रखा
विदेश नीति में हर मौके पर दिखना जरूरी नहीं, कई बार सही समय पर सही दूरी भी ताकत होती है।
अंत में सवाल यही है:
क्या भारत ने मौका खोया, या फिर उसने जानबूझकर एक बड़ी रणनीतिक चुप्पी अपनाई?
- “Ceasefire Credit Pakistan?”
- “Shahbaz ne roki war?”
- “War Stop by Pakistan?”
- “Ceasefire ka asli hero?”
- “Pakistan ka Peace Game?”
- “Sach ya Propaganda?”
- “Ceasefire Mystery!”
- “Kisne roki jang?”
- “Big Peace Move?”
- “Pakistan in Spotlight!”












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